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Mantra Rig 01.003.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 3 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 6 of Varga 5 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 24 of Anuvaak 1 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

इन्द्रा या॑हि॒ तूतु॑जान॒ उप॒ ब्रह्मा॑णि हरिवः सु॒ते द॑धिष्व न॒श्चन॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः सुते दधिष्व नश्चनः

 

The Mantra's transliteration in English

indrā yāhi tūtujāna upa brahmāi hariva | sute dadhiva naś cana ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

इन्द्र॑ या॒हि॒ तूतु॑जानः उप॑ ब्रह्मा॑णि ह॒रि॒ऽवः॒ सु॒ते द॒धि॒ष्व॒ नः॒ चनः॑

 

The Pada Paath - transliteration

indra | ā | yāhi | tūtujāna | upa | brahmāi | hari-va | sute | dadhiva | na | canaḥ ॥



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।००३।०६

मन्त्रविषयः

अथेन्द्रशब्देन वायुरुपदिश्यते।

ईश्वर ने अगले मन्त्र में भौतिक वायु का उपदेश किया है-

 

पदार्थः

(इन्द्र) अयं वायुः। विश्वे॑भिः सो॒म्यं मध्वग्न॒ इन्द्रे॑ण वा॒युना॑। (ऋ०१.१४.१०) अनेन प्रमाणेनेन्द्रशब्देन वायुर्गृह्यते। (आ) समन्तात् (याहि) याति समन्तात् प्रापयति (तूतुजानः) त्वरमाणः। तूतुजान इति क्षिप्रनामसु पठितम्। (निघं०२.१५) (उप) सामीप्यम् (ब्रह्माणि) वेदस्थानि स्तोत्राणि (हरिवः) वेगाद्यश्ववान्। हरयो हरणनिमित्ताः प्रशस्ताः किरणा विद्यन्ते यस्य सः। अत्र प्रशंसायां मतुप्। मतुवसो रुः सम्बुद्धौ छन्दसीत्यनेन रुत्वविसर्जनीयौ। छन्दसीरः इत्यनेन वत्वम्। हरी इन्द्रस्य। (निघं०१.१५) (सुते) आभिमुख्यतयोत्पन्ने वाग्व्यवहारे (दधिष्व) दधते (नः) अस्मभ्यमस्माकं वा (चनः) अन्नभोजनादिव्यवहारम् ॥६॥

(हरिवः) जो वेगादिगुणयुक्त (तूतुजानः) शीघ्र चलनेवाला (इन्द्र) भौतिक वायु है, वह (सुते) प्रत्यक्ष उत्पन्न वाणी के व्यवहार में हमारे लिये (ब्रह्माणि) वेद के स्तोत्रों को (आयाहि) अच्छी प्रकार प्राप्त करता है, तथा वह (नः) हम लोगों के (चनः) अन्नादि व्यवहार को (दधिष्व) धारण करता है ॥६॥

 

अन्वयः

यो हरिवो वेगवान् तूतुजान इन्द्रो वायुः सुते ब्रह्माण्युपायाहि समन्तात् प्राप्नोति स एव चनो दधिष्व दधते ॥६॥

 

 

भावार्थः

मनुष्यैरयं वायुः शरीरस्थः प्राणः सर्वचेष्टानिमित्तोऽन्नपानादानयाचनविसर्जनधातु-विभागाभिसरणहेतुर्भूत्वा पुष्टिवृद्धिक्षयकरोऽस्तीति बोध्यम् ॥६॥

जो शरीरस्थ प्राण है, वह सब क्रिया का निमित्त होकर खाना पीना पकाना ग्रहण करना और त्यागना आदि क्रियाओं से कर्म का कराने तथा शरीर में रुधिर आदि धातुओं के विभागों को जगह-जगह में पहुँचानेवाला है, क्योंकि वही शरीर आदि की पुष्टि वृद्धि और नाश का हेतु है ॥६॥





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